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आनंद मोहन के बदले तेवर से JDU में हलचल, नीतीश कुमार ने शुरू की राजपूत नेताओं की लामबंदी

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बिहार में आनंद मोहन के बागी तेवर से जेडीयू और एनडीए की राजनीति गरमा गई है। बेटे चेतन आनंद को मंत्री पद नहीं मिलने के बाद नाराजगी खुलकर सामने आई। अब नीतीश कुमार ने राजपूत नेताओं की लामबंदी शुरू कर दी है।

पटना/आलम की खबर:बिहार की राजनीति में इन दिनों सियासी हलचल तेज हो गई है। पूर्व सांसद और बाहुबली नेता आनंद मोहन सिंह के लगातार बदलते तेवरों ने जनता दल यूनाइटेड (JDU) के अंदर बेचैनी बढ़ा दी है। दूसरी ओर एनडीए खेमे में भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि यह मामला केवल व्यक्तिगत नाराजगी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे बिहार की सामाजिक और जातीय राजनीति का बड़ा समीकरण भी छिपा हुआ है। खासकर राजपूत वोट बैंक और सत्ता संतुलन को लेकर नई राजनीतिक रणनीतियां तैयार होने लगी हैं।

पिछले कुछ दिनों से आनंद मोहन जिस आक्रामक अंदाज में जेडीयू नेतृत्व और सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, उसने बिहार की राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। कभी अपने बयानों से सरकार पर निशाना साधना, तो कभी पार्टी के अंदर चल रही राजनीति पर खुलकर हमला करना—इन सबने यह साफ संकेत दिया है कि अंदरखाने सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आनंद मोहन की नाराजगी केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि भविष्य की बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है।

मंत्री पद नहीं मिलने से बढ़ी नाराजगी

दरअसल, बिहार में नई सरकार बनने के दौरान आनंद मोहन परिवार ने एनडीए के लिए अहम भूमिका निभाई थी। उनके बेटे चेतन आनंद ने उस वक्त राजनीतिक रूप से बड़ा फैसला लेते हुए राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से दूरी बनाई और फ्लोर टेस्ट के दौरान एनडीए सरकार के पक्ष में खड़े नजर आए। उस समय राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज थी कि इस समर्थन के बदले आनंद मोहन परिवार को सरकार में बड़ी हिस्सेदारी मिल सकती है।

हालांकि बाद में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में चेतन आनंद को जगह नहीं मिली। इसके बजाय जेडीयू ने दूसरे नेताओं को मौका दिया। यहीं से आनंद मोहन की नाराजगी खुलकर सामने आने लगी। उन्होंने पार्टी के भीतर चल रही राजनीति और फैसलों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। इतना ही नहीं, उन्होंने इशारों-इशारों में पैसे और प्रभाव की राजनीति का आरोप लगाकर पार्टी नेतृत्व को भी कठघरे में खड़ा कर दिया।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार की राजनीति में मंत्री पद केवल सत्ता का हिस्सा नहीं होता, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का भी बड़ा संदेश माना जाता है। ऐसे में चेतन आनंद को जगह नहीं मिलने को आनंद मोहन समर्थक अपनी राजनीतिक उपेक्षा के तौर पर देख रहे हैं।

नीतीश कुमार ने संभाला मोर्चा

आनंद मोहन के लगातार हमलों के बाद अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पूरी तरह सक्रिय नजर आने लगे हैं। हाल ही में उनका अचानक जेडीयू एमएलसी और वरिष्ठ राजपूत नेता संजय सिंह के आवास पर पहुंचना राजनीतिक गलियारों में बड़े संकेत के तौर पर देखा गया। इस मुलाकात ने यह साफ कर दिया कि जेडीयू अब इस पूरे विवाद को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।

संजय सिंह ने भी आनंद मोहन पर तीखा हमला करते हुए उन्हें “पुत्रमोह में धृतराष्ट्र” तक कह दिया। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई। माना जा रहा है कि जेडीयू अब राजपूत समाज में अपने दूसरे नेताओं को आगे कर यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी किसी एक चेहरे पर निर्भर नहीं है।

नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा सामाजिक संतुलन और जातीय समीकरणों पर आधारित रही है। ऐसे में आनंद मोहन जैसे प्रभावशाली नेता की नाराजगी को नजरअंदाज करना जेडीयू के लिए आसान नहीं माना जा रहा। यही वजह है कि अब पार्टी स्तर पर डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तेज हो गई हैं।

ललन सिंह की चुप्पी भी बनी चर्चा का विषय

इस पूरे घटनाक्रम में केंद्रीय मंत्री और जेडीयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह का रवैया भी राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गया है। मीडिया ने जब उनसे आनंद मोहन विवाद को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी। उनकी यह चुप्पी कई तरह के राजनीतिक संकेत दे रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जेडीयू फिलहाल खुलकर टकराव की स्थिति नहीं चाहती। पार्टी संभवतः पहले यह समझने की कोशिश कर रही है कि आनंद मोहन की रणनीति आखिर क्या है और उनका अगला कदम क्या हो सकता है। यही कारण है कि कुछ नेता आक्रामक बयान दे रहे हैं, जबकि कुछ वरिष्ठ नेता फिलहाल दूरी बनाकर चल रहे हैं।

राजपूत राजनीति पर बढ़ी नजर

बिहार की राजनीति में राजपूत वोट बैंक हमेशा अहम भूमिका निभाता रहा है। आनंद मोहन लंबे समय से इस समाज के प्रभावशाली चेहरे माने जाते रहे हैं। ऐसे में उनके बागी तेवर केवल एक नेता की नाराजगी नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक समीकरण को भी प्रभावित कर सकते हैं।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि यह विवाद आगे बढ़ता है तो इसका असर आगामी चुनावों पर भी दिखाई दे सकता है। खासकर तब, जब विपक्ष इस नाराजगी को राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश करे। हालांकि अभी तक आनंद मोहन या उनके परिवार की ओर से एनडीए छोड़ने जैसा कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन लगातार दिए जा रहे बयान सियासी तापमान जरूर बढ़ा रहे हैं।

NDA के भीतर बढ़ सकती है खींचतान

इस पूरे विवाद का असर केवल जेडीयू तक सीमित नहीं है। एनडीए के अंदर भी इसे लेकर चर्चा तेज हो गई है। बिहार में भाजपा और जेडीयू के बीच पहले ही कई मुद्दों पर अंदरूनी प्रतिस्पर्धा की चर्चा होती रही है। ऐसे में यदि आनंद मोहन का विवाद और बढ़ता है, तो इससे गठबंधन की राजनीति पर भी असर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण और व्यक्तिगत प्रभाव दोनों का बड़ा महत्व होता है। आनंद मोहन जैसे नेता की नाराजगी यदि लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर कई सीटों पर देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि जेडीयू अब इस मामले को केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं मान रही।

आने वाले दिनों पर टिकी नजर

फिलहाल बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आनंद मोहन आगे कोई बड़ा राजनीतिक फैसला लेंगे या फिर यह केवल दबाव की राजनीति का हिस्सा है। दूसरी ओर नीतीश कुमार भी पूरी सक्रियता के साथ अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुट गए हैं।

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि आने वाले दिनों में राजपूत नेताओं की बैठकें और राजनीतिक गतिविधियां तेज हो सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो बिहार की राजनीति में एक नया समीकरण बनता दिखाई दे सकता है।

अभी के लिए इतना तय माना जा रहा है कि आनंद मोहन की नाराजगी ने बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह विवाद किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरे राज्य की नजर टिकी हुई है।

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